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Friday, December 7, 2012

प्रश्न अनुत्तरित......


‎'तुम बेटी हो
सबों की सेवा के लिए जन्म हुआ तुम्हारा
घर के काम काज सीखो
पढो लिखो , नौकरी करो ...नौकरी करनेवाली
बेटी का ब्याह
हाथो हाथ हो जाता है ...
क़िस्त क़िस्त में दहेज़ जुटाती है
सास ससुर की छाती जुडाती है
पति के मन के अनुरूप चलना
अंत में स्वर्ग पाना ............'
......और इसीलिए
भोर से रात तक ,जन्म से मरण तक
जीती हूँ तुम्हारे लिए
गृहस्थी की गाड़ी में बैल की तरह जुती हूँ तुम्हारे लिए।।
अपना होश कहाँ
अपनी सुध भूल जाती हूँ

और तुम ..??

कभी सब्जी में नमक नही
चाय में चीनी कम
कुरते में बटन नही ..घर द्वार साफ नही
बिस्तर मैली कुचैली
झोल झाल से दीवारें भरी ..कुछ करने का शवुर नही
और न जाने क्या क्या
दिन रात सुनती हूँ ,सुनती रहती हूँ
तुम्हारी आवाजे दीवारों को ही नही
दिल के धडकनों को भी रोक देती है
सोचती रहती हूँ
सुख दुःख जन्म मरण में साथ देने के वचनों के साथ
तुमने मुझे लाया था
मन को सपनो से सजाया था
घर से बाहर तक का काम मै करती हूँ
क्या मै तुम्हारी पत्नी हूँ ?? या कि जीवन पर्यंत
बिन तनखाह खटने वाली नौकरानी हूँ ??

प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है................

2 comments:

  1. नारी मन की व्यथा का बहुत मर्मस्पर्शी चित्रण..लेकिन यह हर घर की कहानी नहीं है...

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  2. Han KS hr ghar ki kahani nhi hai...pr hr nari ke antar se ek samay pl bhr ke liye ye uchchhwas niklti hai...
    thanx alot

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