Wednesday, December 5, 2012

-अहीं बाजु.....


भगवन !
अहाँ तं मनुखक निर्माण केलों 
तखन ई अमीर गरीब के बनौलक ? 
जाति पाति, धर्म अधर्म क देवार
के ठाढ़ केलक  ? 
संबंधक इतिहासक पन्ना यांत्रिक युगक 
बरखा मे गलि गेल अछि 
भूख पिआस गरीबक मरि गेल अछि 
पलास सँ आगि निकलि रहल अछि 
                   हवा सँ बाण 
रेतकण झुलैस  रहल , वर्षा कें 
               अभिमान !
डोका कांकोर करमी पर जीवैत
देह पर फाटल चीटल वस्त्र नेने 
की ओकरा अहाँ ह्रदय नहि देने छी ?
की ओहि मे इच्छा कामना 
                 नहि अंकुरेने छी ?
आंखि मे सपना नहि जगौने छी ??
तखन किएक गरीब आर गरीब 
भेल जा रहल..
गरीबीक अभिशाप अमीरी क वरदान 
      बनल  जा रहल
की ओकर भगवन केओ आन छैथ 
छैथ तं के छैथ ---अहीं बाजु..... 
                           ( भावांजलि सँ )

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