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Tuesday, November 10, 2015

अमा की कालिमा को  हरने दीपों की पाती जगमगा उठी
जैसे खुशियों के सैलाब
गमो के पहाड़ से
फूट पड़े हैं .
ये दिवाली आती जगमगाती
दिलो को रोशन  करती
उम्मीदे कितनी जगाती.....
भूल जाओ अपनी व्यथा को
राग भरो अनुराग भरो
जन जन में अनुपम सौहार्द्र भरो..

धरती  पर जितने दीप  जले
उतनी ही खुशियाँ  तुम्हे मिले .

.

Friday, October 30, 2015

करवा चौथ

बूढ़ी माँ 
करवा चौथ के दिन निहार रही थी
बालकोनी से चुपचाप 

सामने पार्क की चहल पहल
हंसी की फुलझड़ियाँ ठहाकों का
गर्म बाजार
मेहँदी रचाती अल्हड बहुएँ बेटियां
बूढी माँ अपनी सूनी हथेलियों को देखती रही
एक उसाँस उसकी छाती चीर निकलती रही
कभी हम भी नारी आंदोलन में रहते थे
पर माता पिता को पहले पूजते थे
बबुआ के पिता भी न जाने कहाँ चले जाते हैं
अवकाश प्राप्त का जीवन वह जी नही पाते हैं
वह कभी अपनी झुर्राती हथेलियों तो कभी
अपनी श्लथ अँगुलियों को निहारती है
एक इंतज़ार खत्म होता है
पति की आँखों में एक खालीपन
पत्नी की मेहँदी विहीन हथेलियों को देख
उसके सूने नयनो में बादल आ जाते हैं
उसकी हथेलियों को प्यार से चूमते --
लो तेरे हाथों में मैंने प्यार की मेहँदी रच दी
वे तो बच्चे हैं हमारे
जो कभी हम थे आज बच्चे हैं हमारे
पत्नी का सर पति के सीने पे लुढ़क जाता है
करवा चौथ का व्रत पूरा हो जाता है------


आह ! रौशनी सी रात मे
चांदनी की शमा जल रही थी
कांच की दीवारों से झांकती
हर लम्हा तेरी याद दिला रही थी
ओ पल आज भी याद है मुझे
तुम्हारी आँखों ने जब
मुझे प्यार किया
दिल का अन्धेरा रोशन हो गया था
आज भी तुम्हारी उन्ही
प्यार भरी नज़रों की आस लिए
अधरों में मुस्कान लिये
बैठे हैं हम शरद पूर्णिमा की
धवल तन्हाइयों मे........
रावण जल गया उस महान पंडित को बुराइयों का प्रतीक समझ हम हर साल जलाते हैं , करोड़ों रूपये स्वाहा कर , वातावरण को प्रदूषित कर हम आनंद मनाते हैं --पर क्या हम अपने अन्दर की बुराईयों को नष्ट कर पाते हैं , अहंकार का नाग फन काढ़े हमारे ह्रदय को ग्रस रहा होता , क्या हम उसे मार पाते हैं??? काश ! मानव मानव बन पाता !, अपने बहार भीतर को पारदर्शी ,निरभ्र और स्वच्छ बना पाता है ???
प्रश्न ढेरों ढेर ,उत्तर कहीं नही.
.देश में किसी के पास नही---

Friday, October 23, 2015

खून के रिश्ते हथेली की उँगलियों की तरह होते हैं  
अपने आप में निर्बंध 
स्वछन्द।
अपने अपने आकाश 
अपने ही संसार
किन्तु
जब किसी पर कोई विपत्ति 
कोई प्रहार होता है 
सारी उँगलियाँ मुट्ठी बन सशक्त हो जाती है
सभी एक हो जाते हैं

ये खुशबू होती है रिश्तों में …।

,Khoon ke rishte hatth ki ungliyon ki tarah hote hain ,apne aap me nirbndh, swachchhnd, / apne apne akash, apne hi sansar . / kintu ,jb kisi pr koi vipatti, prahar hote hain to ,sari ungliyan muthhi bn sashkt ho jati hai / sbhi ek ho jate hain ..ye khushboo hoti hai rishto ki..

Wednesday, September 16, 2015

आखिर कब तक ,कब तक आखिर तुम कौन हो  ? क्यों आ आ  कर मुझे तडपा जाते  ? तुम्हे देखने के लिए  कितनी बेकल हो उठी हूँ मै. कितनी छटपटा रही हूँ मै.  ओ अदृश्य ! अब नही सहा जाता 
कब तक यूँही  भटकती रहूंगी , हर चेहरे में तुम्हारा चेहरा, हर छवि में तेरी छवि , हर स्वर में तेरा स्वर मुझे भरमा जाता है  ऐसा एहसास वो तुम हो ..वो तुम हो..दौड़ जाती हूँ , एक मृगतृष्णा के पीछे...परछाही के पीछे भागती , दौडती.....
कोई भी दर्द भरा गीत गता है, कोई भी धुन कहीं से आती है  लगता है तुम मुझे पुकार रहे हो  पुकार रहे हो, मै विक्षिप्त  हो जाती हूँ...मेरे जीवन की उषा बेला में भी ये ही पुकार मुझे छटपटा जाती थी..आज सांध्य बेला में भी...तुम कौन हो ..तुम कौन हो  ??ए 
चारो ओर रज़त चांदनी की तरह पानी का जाल बिछा हुआ है...घास सेवार पानी की लहरों पर , हवा  के झोंको के साथ अंगेठी  लेते थिरक  रहे हैं. . जलघास के हिलते डुलते पत्ते जैसे मुझे बुलाने के तेरे संकेत ही ना हो जलघासों के बीच पानी में तैरती एक छोटी सी चिड़िया किनारे की तलाश में कभी सेवारों से बिंध  जाती है तो कभी करमी लत्ती में उलझ जाती है. ...वो भी मेरी तरह ही किसी की तलाश में है, कितनी मजबूर ,कितनी दयनीय स्थिति है उसकी...कभी कभी एक एहसास होता है  तुम मेरे बालों से खेलते निकल जाते हो ....'ऐसा लगता है किसी ढीठ  झकोरों की तरह , खेल आयी है तेरे उलझे हुए बालों से....' तुम्हारे स्पर्श की अनुभूति में डूब डूब जाती हूँ , अधरों पर एक स्वर्गिक मुस्कान खेल जाती है , चेहरा अलौकिक आभा से उद्भासित हो जाता है..आँखें मुंड कितनी देर तक मै तुम्हारे सामीप्य की अनुभूति  में डूबी रहती हूँ...और फिर सपना टूट जाता है , दुनिया मुझे अपनी निर्मम  बाँहों में खींच लेती है....तुम कहीं नहीं ..कहीं नही...तुम मुझे छोड़ भी नही पाते, मै तुम्हे भूलना चाह कर  भी भूल नही पाती  , ये कैसे बंधन हैं, ये कैसे रिश्ते हैं..क्या सात जन्म इसी को कहते हैं..
एक दिन तुमने मेरी  हथेलियों को चूमते हुए कहा था --लो मैंने तेरी हथेलियों को विश्वास से भर दिया है . तुम मेरा विश्वास करती रहना , ये हाथ अब अबल नही, बेजान नही . इसमें मेरे विश्वास 
का नन्हा पौधा लगा है ..मै हर वक़्त तुम्हारे साथ हूँ , हर पल  हँ-- तुम यूँही विश्वास और प्यार दुनिया को बांटती रहना..
मेरी हथेलियाँ ही नही मै  पुरे की पुरे  तुम्हारे विश्वास से भर उठी थी. सारा तन तेरे प्राण से अनुप्राणित हो उठा था , कैसी विडंबना थी मेरी भी ..नियति  का अपना भी तो कुछ रंग होता है..तुम चले गए अपना विश्वास मुझे सौंप कर ..तुम फिर अदृश्य हो गए मेरी साँस बन कर ..आज लगता है की वो सपना था या सत्य  ??  पर मेरी हथेलियों में लगे विश्वास का वो पौधा , मेरे आंसुओं  से सिंचित हो आज विशाल वटवृक्ष बन गया है ..उसे कोई भी शक्ति उखाड़ नही सकती ..खुद तुम भी नही..पर मेरी आत्मा भटक रही है, मै थक गयी हूँ, दुनिया के सुरतालको  मै समझ नही पाती हूँ , संगत बिठाते बिठाते हताश निराश हो उठती हूँ कभी कभी ..तुमने भी तो नही सिखाया और छोड़ गए मझधार में.................... 
तुम हो कहाँ..भटकती हवाओं  का संस्पर्श तो पाती हूँ , पर तुम्हारी तरह ही अदृश्य ..इन मेघमालाओं में विचरने की पहचान तो मुझ में अंकित है ही पर वे भी तुम्हारी तरह दूर मुझसे काफी दूर...दुःख मेरा जीवन साथी बन गया है, नही , शायद मैंने दुःख को अपना लिया है, नही नही  दुःख ने ही मुझे अपना लिया है.. पता नही किसने किसको  अपनाया है , पर वो मेरा प्रियतम  बन बैठा ,वो मेरी मुस्कान है , शायद इसीलिए तुम्हारी तलाश अभी भी जारी है ...तुम्हारी तलाश में दर्द ने मेरा साथ दिया , दुःख ने मेरा हाथ पकड़ा और मै तुम्हे  खोजती रही ..पगले, ये कैसा अपनापन है , कैसी बेकली है....तुम्हे पता भी नही..तुम्हारी तलाश मेरी पूजा है , मेरा ध्यान है धर्म है....

 की बातें की थी ना ? कुछ ऐसी  ही थी ना आने वाले भविष्य की पूर्वसूचना ----मै तेरे चेहरे को पहचान कर भी ना पहचान पाई थी ..मै पलंग पर पड़ी थी, मेरे सिरहाने आके तुम बैठ गए थे , तुम्हारे प्रेमिल स्पर्श से तन मन मेरा सिहर उठा था ..मै उन्मन हो उठी थी ..सम्मोहन के पल टूट गए मै वास्तविकता में आ गयी थी..सोचती रह गयी पल भर के लिए ही तुम क्यों मेरे पास आये होगे ..जानती हूँ तुम मुझे दुःख मे देखना नही चाहते..पर दुखी क्यों कर जाते हो...  किन्तु जब गहराई मे सोचती हूँ  सपने का एक एक क्षण ,एक एक टुकड़ा प्रकम्पित कर जाता है मुझे -- जब कोई अजनबी मन के दर्पण मे ,आत्मा मे अपनी छवि उतार देता है तो फिर वह प्राण प्रिये बन जाता है , एक ऐसा प्यार जो पूजा के हद तक पवित्र है और तीव्र है ..फिर हम तुम दो कहाँ रह गए एक परछाही सी मेरे इर्द गिर्द भटकती रहती है और मै  कोई प्यासी  आत्मा , अधूरी  आत्मा  उस परछाही से लिपटने को बेजार ......ऐसा क्यों लगता है, ऐसा क्यों होता है...जब मैंने अपनी आत्मकथा किस्त किस्त जीवन लिखी  तो वो मेरी आपबीती थी. किन्तु किसी ने कहा सारी की सारी ४०० पृष्ठों मे अदृश्य रूप से तुम्हारी ही छवि थी...मैंने तो स्थितियों, परिस्थियों के साथ तुम्हारा जिक्र किया था औरों की तरह ही...फिर फिर...मेरे सम्पूर्ण जीवन आराधन को तुमने अपने प्यार के रेशम धागों से बांध रखा है......
क्रमश;  ( मैथिली से अनुदित )

Friday, September 11, 2015


लताएँ तरुवर का सहारा ले आगे 
बढती हैं किन्तु, 
बेसहारा नही होती ये लताएँ 
सहारे की तलाश करती भी नही 
ये लताएँ अपना रास्ता खोजती 
अपनी मंजिल को तलाशती 
धरती की ही गोद में ,उसी के वक्ष पर 
यत्र तत्र फ़ैल जाती ये लताएँ ..
जिन्हें आकाश छूने की ललक है 
वो किसी न किसी उर्ध्वगामी तरुवर  का 
सहारा ले 
ऊँचाइयों के सपने देखने लगती है 
कामनाओं की डोर  बुनने लगती है 
प्यार से दुलार से  तरुवर को 
अपनी भुजाओं में बांध लेती  ये लताएँ 
और फिर 
तरुवर का ह्रदय स्पंदित ; प्रकम्पित लता की आत्मा 
शिव और शक्ति कीतरह 
प्रकृति और पुरुष की तरह 
आसमान की ऊँचाइयों को छूने का 
प्यार ममता मानव कल्याण का औदात्य भाव 
बिखेरने का संकल्प लेती 
पनपती जाती ये लताएँ ............
अपने जीवन का परिचय किससे कहना 
कैसे कहना !
धरती के कण कण में अपने मन का 
रमते रहना 
मिटने में ही मैंने जाना जी जाने का 
स्वाद 
आंसू के माला का तर्पण 
औ हँसने  का अवसाद !
तुमने कहा बंधु  मेरे
लो मेरा ये वरदान 
मेरे स्नेह के निभृत निलय में पी जाओ 
सब अपमान  
तुमने केवल सहना जाना ,सहने में जीवन 
की प्यास मै 
अमृत ले आया हूँ , करुण जगती की आस '`
मैंने अपने दृग उठाए अचंचल स्थिर पलक 
पुतलियों की लहरों पर 
वेदना थी रही छलक ..
तुम तो अमृत के बेटे हो , अमृत लेकर आये हो 
मेरे अभाग्य को अपनाकर निज 
सौभाग्य बनाने आये हो पर 
मै हूँ अभिशाप की छाया जलना और जलाना जाना 
तेरे अमृत-घट को भी झुलसाना  जाना 
दूर रहो तुम मीत मेरे 
मेरे सुख दुःख मेरे गम से अभिशाप की बदली में 
डूबे 
टुकड़े टुकड़े जीवन के तम से ............




Thursday, September 10, 2015

.खिड़की से झांक रहे थे हम तुम 
बारिश हो रही थी 
कोई वृद्ध दम्पत्ति
एक छाते के तले 
फूल तोड़ते सैर पर जा रहे थे 
तुम ने कहा था
देखती हो
हम तुम जब बूढ़े हो जायेंगे
तो ऐसे ही बारिश में छाते लेकर
सैर करेंगे
और मैंने मचलते हुए कहा था ---
साथ ही गायेंगे –
प्यार हुआ इकरार हुआ
किस तरह शिशु की तरह
खिलखिला उठे थे तुम
किन्तु वो दिन आया ही नही
तुम्हे जाने की जल्दी जो थी ....

आज आकाशवाणी दिल्ली में कवयित्री गोष्ठी ( हिन्दी ) की रिकॉर्डिंग थी। मैं यानि शेफालिका वर्मा , इन्द्रा मोहन ,अनुप्रिया एवं रजनी अनुरागी आकाशवाणी के स्टूडियो में । इसका प्रसारण 21.9.2015 को 12.5 बजे दिन में महिला विभाग कार्यक्रम में MW 366.. 3 819 KB3 पर होगा .







DAINIK JAGRAN 

Jab tak hmm INDIA ko BHARAT nhi bolenge tab tk hmm gulam hain . Kisi bhi desh ka nam angreji me nhi sabon ka original hai ..yahan tk ki NEPAL bhi sbhi bhashaon me Nepal hi bolte hain ..Jb tk hm videshon me I AM FROM BHARAT nhi bolenge INDIA ko bhul nhi jayenge ..tb tk hm indirectly paradhin hain....

Thursday, August 13, 2015

स्वाधीनता दिवस --??
परिवर्तन होते हैं किन्तु ,विकास के लिए,अच्छाई के लिए !..आज वैज्ञानिक,वैचारिक क्रांति से देश ही नही सारा विश्व गाँव बन गया है पर कभी हमने सोचा हम खुद कितने दरिद्र बन गये हैं .? हम अपने देश को क्या दे रहे हैं ? मुझे याद आ रहा है ..शायद ९० के दशक तक स्कूल में बच्चों की छुट्टियाँ नही होती बल्कि झंडोत्तोलन के लिए उन्हें बुलाया जाता . झिलिया बुनिया से जलेबी तक का सफर जनगण गाने के लिए बच्चों की टोली बनती थी ,जो स्कूल के बाद सारे दफ्तरों में उन्हें राष्ट्रीय गायन के लिए ले जाया जाता . एक जुनून सा रहता था बच्चों में ,जब टीवी नही था लोग रेडियो,ट्रांसिस्टर ओन रखते थे, सुबह से ही ..अय मेरे वतन के लोगो-- इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के -- वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हो -- इंसाफ की डगर पर बच्चो दिखाओ चल के ,ये देश है तुम्हारा ,नेता तुम्ही हो कल के . आदि .राष्ट्रीय गानों से देश की फिजा ही नही घर घर की दीवारें उत्साहित होती,उन्मादित रहती , बच्चे,बूढ़े जवानों में ,पढेलिखों से अनपढ़ों में भी ..इस देश का यारो क्या कहना ....
पर विकास के नाम पर सारी व्यवस्था ही अविकसित हो गयी है.. अभी भी समय नही बीता, जब जागो तभी सबेरा ..अभी भी सारे स्कूलों--कोलेजों में इस पावन त्यौहार को चाहे वो सरकारी हो या प्रायवेट कड़ाई के साथ लागू किया जाना चाहिए ,तभी बच्चे आगे चलकर इन्सान बनेंगे हैवान नही ,जिससे बच्चों का चरित्र निर्माण हो ,देश और देशभक्ति के जज्बा को समझे . लोग एक दिन पहले ही खानापूर्ति कर लेते हैं .किन्तु इसका प्रभाव नकारात्मक ही रहता है. जिस तरह से आज के ज़माने में माता पिता अपने ही बच्चों के घर में मेहमान बन के रह गये ठीक उसी तरह हमारे ये दो पावन त्यौहार हमारे देश में बस मेहमान बन कर रह गये ...ये कौन सा विकास ? कैसा परिवर्तन? राखी , दशहरा, सरस्वतीपूजा हरेक के गाने की जगह चिकनी चमेली,शीला की जवानी ने ले ली है..क्यो कि बच्चों को ये ही पसंद है और वे मानवता के गुणों को भूलते जा रहे हैं. भूलते जा रहे है केसरिया बल भरने वाला ,सादा है सच्चाई , ये हिमालय सा उठा मस्तक न झुकने पायेगा ............ ..
DEKHO KABHI BARBAD NA HOWE YE BAGICHA
ISKO HRIDAY KE KHUN SE BAPU NE HAI SINCHA ..

VIPRALABDHA

VIPRALABDHA 




आशीर्वचन 
  प. हरिमोहबं झा 

सौ. शेफालिका  वर्मा के हम तहिये स जनैत छियेंह  जहिया ओ दस-ग्यारह  वर्षक  बालिका  छलीह .  हुनक पीता ( बंधुवर श्री ब्रजेश्वर  मल्लिक ) , ओ यदा कदा अपन रानीघाट लग निवास मे निमंत्रण देत  रहैत छलाह   ( जाहि मे षटरस  ओ नवरस  दुहूक समावेश रहैत छलैक ) . साहित्य गोष्ठी  क परिसमाप्ति  'मधुरेण ' होइत छलैक. 
ओही माधुर्यमय  वातावरण मे  मेधाविनी  कन्याक प्रतिभा संस्कार विकसित होइत  गेलैन्ह...आई ओ एक सुकुमार  शब्द-शिल्पिनी कवियत्री -लेखिका क रूप मे विख्यात छैथ. हम हुनक  'स्मृति रेखा '  मे मर्मस्पर्शिनी  भावुकता देखि  शुभकामना प्रकट केने रहियेंह जे एक दिन ओ 'मैथिली क महादेवी ' रूप मे प्रसिद्द हेतीह, आय हुनक 'विप्रलब्धा मे भावनाक कोमलता  करूँ रस्क परिपाक देखि ओ आशा पल्लवित  भ गेल  अछि.  'शेफालिका' अपन नाम सार्थक करैत  निरंतर सिंगारहार क माला  गुंथी   वाणी देवीक मुकुट पर अर्पित करैत रहथु, इयह आशीर्वाद देत छियेंह .

मंगलकामना 
            मणिपद्म 
एकटा सिस्कैत कवियत्री  आ एकटा भावभिजल व्यक्तित्व  हमरा बंगलाक  सुप्रसिद्ध  कवियत्री   अरुदत्त आ तरुदत्त क झांकी भेटे लागैत अछि  हिनक पाती सब मे ..
आर अधिक सफलता ,आर अधिक मंगल कामना क संगे..
बेहडा , १४. ७ ७७ 

अभिमत 
   आरसी प्रसाद सिंह 
शेफालिका जीक कविता मे नवीनता क संग संग मौलिकता अछि. . समाजक बदलल परिवेश मे वर्तमान व्यक्ति केर मनोदशा , भावना एवं अनुभूति जाही प्रकारे प्रभावित  भेल अछि से विप्रलाब्धाक कवयित्री द्वारा  एकदम  आधुनिक सन्दर्भ मे वाणी  पाओल अछि. से ग्रंथक नाम विप्रलब्धा  कोनो रीतिकालीन  अतीतक खाहे जतेक विज्ञापन करओ ,मुदा ओकर प्रत्येक रचना  अपन एक एक पाती मे युग बोधक अदम्य स्वर झंकृत क रहल अछि.  की भाषा ? की भाव?  दुहु मे  शेफालिका जी क परतरी नहि ! 
एरौत       ९.७.'७५ 

शुभेच्छा 
   डॉ. रामकुमार वर्मा 

अखिल भारतीय  मैथिली सम्मलेन, इलाहाबाद मे कवियत्री  शेफालिका  की  प्रतिभा से मै जितना प्रसन्न हूँ उतना ही चकित भी हूँ. इतनी छोटी अवस्था  में  उन्होंने साहित्य में जो  अंतर्दृष्टि पायी है  वह उनके स्वर्णिम  भविष्य की अग्र्सुचिका है. . उनके काव्य संग्रह 'विप्रलब्धा' का  भावोत्कर्ष  आज के नवयुग के कवियों के लिए अनुकरणीय है. 
सम्मलेन के अधिवेशन  में उन्होंने एक सर्वोत्कृष्ट  सम्मान भी अर्जित किया, उन्हें डॉ. उमेश मिश्र स्मृत स्वर्ण-पदक  से आभूषित किया गया .  उनकी काव्य-प्रतिभा भविष्य में और अधिक सम्मान की अधिकारिणी होगी , इसमें कोई संदेह नहि. 
मेरा उन्हें हार्दिक आशीर्वाद है की वे भारतीय साहित्य और संस्कृति में योग देकर  और भी बड़े सम्मान और अलंकरण प्राप्त करें और हमारे देश और साहित्य को उं पर अभिमान हो..
                                             साकेत. इलाहाबाद-२ 

विप्रलब्धा केर भूमिका 
        डॉ. केदार नाथ लाभ 
श्रीमती  शेफालिका वर्मा  आधुनिक मैथिली कविताक पारिजात पत्र पर अंकित एकटा सिंदूरी हस्ताक्षर छैथ. जेना कारी  कारी केश-जालक  बीच     श्वेत सिउंथ पर सिन्नुरक रश्मि-रेख अपन आलोक लोक सँ दीपित भ सहजहि सम्मोहक भ जायत अछि  तहिना श्रीमती शेफालिका वर्मा  अपन अंतर्मनक  नील गगनक  आर पार पसरल कोनो अतल-असीम वेदना व्यथाक घनखंडक  मध्य अपन काव्यक रश्मि रागिनी आ ज्योति-ज्वार सँ सहजहि हिय-हारिल भ गेल छथि.  
---------एहि दृष्टिये शेफालिका वर्मा क परिगणना  ओहि   स्कूल  में हेतनि जकर विचार-धारणा श्री  रविन्द्र नाथ ठाकुर  प्रतिपादित करैत छैथ. वस्तुतः कला अथवा काव्य  कविक मानसिक विलास अथवा बौधिक व्यायाम  नहीं होइछ  आ ने ओ कविक नैतिकता अथवा समाज शाश्त्रीयताक दार्शनिक  अभिव्यक्ति होइत अछि. ओ त मात्र कविक विवशता थीक . कलाक माध्यम स कलाकार अपन शुद्ध व्यक्तित्व  के निर्वस्त्र  क दैत अछि , कविताक माध्यम स कविक अंतर्व्यक्तित्व निर्वसन भ जायत छैक. एक हद धरि  कविता कवि क व्यक्तित्वक कृत्रिम खोल उतारि  क ओकर रग रगक पारदर्शी  रूप सभक समक्ष  प्रस्तुत क दैत छैक. 
--------प्रस्तुत कविता संग्रह  ' विप्रलब्धा ' में  संकलित कविता सभ  शेफालिका जीक व्यक्तित्वक  निरभ्र पारदर्शी रूप के हमरा सभक समक्ष सम्पूर्ण चारुता आ मनोग्यता क संगे  प्रस्तुत करवा  में सफल - समर्थ सिद्ध भेल अछि . ओस-विन्दुक अलस भार सँ सज्जित कमल-दल जकां  ई कविता संग्रह हिनक वैयक्तिक  अनुभूति राशि क  कोमल,करुण ,सजल-तरल, सुकुमार संभार सँ सहजे रमणीय आ तलस्पर्शी  भ गेल अछि . हिनक भाव बोधक क्षितिज अभिनव कलात्मकता क अरुणाभा सँ रंजित अछि. कथ्य्क संगे  अभिव्यंजना क  चारूत्व ,रूप-विधांक    सौश्ठव   आ चित्र धर्मिता जतवे चाक्षुष अछि ततवे भास्वरो. .
                                                     शेफालिका जी गीत अगीत  ( मुक्त वृत्त में प्रणित काव्य )  दुनू प्रकारक काव्यक प्राणवंत कवयित्री छथि. हिनक काव्यक संसार गहन संवेदनाक माटि पानि  सँ नमनीय आ रस-स्निग्ध तथा निश्छल अनिरुद्ध   अभिव्यक्तिक सहजता सँ सुकुमार आ सुवासित अछि.  हिनक काव्य में ' स्पर्शक गन्ध ' आ गंधक अनुभूति' अछि. एते  'आँचर में  इन्द्रधनुष  उतरल'  अछि, कामनाक छाउर ' तथा ' मृत्युक  महक --------





Thursday, August 6, 2015


एक तरफ हवा बसन्ती
एक तरफ मन का मधुकर
दोनों से मन उदास पड़ा था
एक तरफ मोबाइल एक तरफ लैपटॉप
खुला पड़ा था
कभी व्हाट्स एप्प की आवाज़
तो कभी एफ बी में मेसेज की टिक टिक
इन सब को सुनती निढाल पड़ी थी
आवाजें कान में आ आकर दस्तक देती रही
पर मै
अनसुनी करती रही
क्या है इन सब में वही रोज रोज का खेला
अच्छी बुरी बातों का मेला
सबों को सुनती मेरा मन अकेला
थक जाती हूँ
नही अब ये सब छोड़ दूंगी
अब नही डूब पाऊँगी
इन स्नेह भंवर में ----------
तभी बसंत की सिहरन में
सब कुछ भूल जाती हूँ
उन्ही संवादों के स्नेह-भंवर में
डूब डूब जाती हूँ
 
Shefalika Verma has written two outstanding book in Maithili ,one a book of poems titled BHAWANJALI and the other a book of short stories titled YAYAWARI . . Her Maithili writings have been translated into many languages including Hindi ,English ,Oriya, Gujrati and others  She is frequently invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are important people. I do not have to give more introduction of her as her achievements speak for themselves .

Shefalika , the poet ,enjoying with her lover , Who else could  he be except her husband ?

I will translate for the readers some of her poems who show her affection for life and the agony of bereavement from her sweetheart.

In my free translation of the poems, I have taken the liberty of adding extra lines of my own, which highlight the real emotions.

Her poems take leaps in all directions and focus on nature, from flowers to lakes and mountains, from the sun to the moon to the stars, and finally she reaches humanity - she embraces them all.

Let us follow her dreams now...

(Poem No. 11)

"The flower "Rajnigandha" is crying,
Although blessed
with a garland of stars,
"Singarhar" is shaking with pain,
The clouds are showering rain...
... from the mouth of the sky.
You came silently
without exposing your body
Now you have become my life.
You are decorating the smile on my lips for eternity."

(Poem No. 14)

"You are searching yourself in my eyes
If you do not see yourself you are lost.
But I have decorated you in my heart."

Then she goes into a different world...

(Poem No.20)

"You make me dance as you wish,
I live my life as you want,
Then why are you measuring the
guilt of each of us?
Oh God, you are not free of guilt!"

(Poem No. 26)

"When my heart becomes desert
You shower rain on it.
And i receive a new life.
You have given me everything:
Truth and falsehood,
Sin and godliness,
Respect and people's hatred."

 
She floats in the heavens now...

(Poem No. 41)

"How will my song reach you?
The fragrance of my breath flies
around the world to reach you.
The tears of my bereaved eyes
flow drop by drop.
You left me, the moon left...
The music vanished from the moonlight.
The beauty of the dawn evaporated from my life,
And the season of songs vanished for me.
I had hoped forever."

And the world changed.

(Poem No. 44)

"Someone came and sang in my ears..
"Spring has arrived."
I got excited.
My body started jumping with the sweet music of the sitar,
Originating from my heart.
I see in the blue sky the smile of the stars.
And I keep deluding myself that life is spring.
How can it possibly be without you?"

She found her soul.

(Poem No. 49)

" I have travelled the world...
Visited all the religious places, dipped in the holy rivers,
And found that in the small space of my heart,
All the elegance of the world exists."

The book "Yayavari" is a series of short stories. It describes the holy places she has visited with her husband. It is full of descriptions of nature, her visions and the enjoyment of the life, of an itinerant traveller. The company of her husband gives her pleasure and fills her mind with a thousand thoughts.

                                   
                         Baidya Nath Varma
Professor  Emeritus of Sociology
The City University of New York
                 USA 
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तुम कहते हो ये घर मेरा है 
बड़े प्यार से इसे बनाया है
भूकम्प में भी रहेगा अकम्पित
 सारी खुशियाँ मेरी इसमें संचित
ये मेरा घर है
अहम का छोटा सा पौधा तुम में झांक उठता है
घर हँसता है
दीवारें मुस्काती है
फिर तुम चले जाते हो
तुम्हारा बेटा..
ये घर मेरा है कितने प्यार से बनाया है
घर हँसता है , दीवारें फिर मुस्का उठती है -
अरे मूढ़ एक एक कर सभी चले जाओगे
मै ऐसे ही खड़ा रहूँगा! 
हो सकता है तुम से पहले 
या तुम्हारे बाद मै ही चला जाऊँ 
पर 
तुम सब की बातें सुनता रहूँगा .....

ना घर तेरा ना घर मेरा 
दुनिया रैन बसेरा-----------------
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तुम हो कहाँ.? 
.भटकती हवाओं का संस्पर्श तो 
पाती हूँ 
 पर तुम्हारी तरह ही अदृश्य ..
इन मेघमालाओं में 
विचरने की पहचान तो 
मुझ में अंकित है ही पर वे भी 
तुम्हारी तरह दूर मुझसे काफी दूर...
दुःख मेरा जीवन साथी बन गया है
नही 
 मैंने दुःख को अपना लिया,
नही नही  दुःख ने ही मुझे 
अपना लिया है.. 
पता नही किसने किसको  अपनाया है 
पर 
वो मेरा प्रियतम  बन बैठा  
मेरी मुस्कान है 
 इसीलिए तुम्हारी तलाश अभी भी जारी है ...
तुम्हारी तलाश में दर्द ने मेरा साथ दिया 
 दुःख ने मेरा हाथ पकड़ा  
मै तुम्हे  खोजती रही .
.ये कैसा अपनापन है 
 कैसी बेकली है....
तुम्हे पता भी नही..तुम्हारी तलाश 
मेरी पूजा है 
मेरा ध्यान है- धर्म है....

.......

प्रीतक इजोरियामे अकुलाइत मोन

प्रीतक इजोरियामे अकुलाइत मोन बाद )

******************************** सम्हरि क' देखलहुँ हुनक लिखल "आखर आखर प्रीत ! युग युगक संयोगल करियौटी भीत पारखी लोकनिक शब्द शब्दकें देखि पतिया लिखब सीखल जे मरणासन्न भ' गेल अछि इंटरनेट आ मोबाइलक युगमे प्रवेश क' क' सर्जिकाक अंतःकरणमे निर्गुणक उन्नायक कबीरक आत्मा मुग्ध अछि हुनकोमे जगौने छल आश सांसारिक चेतनाक आभास तखन ने ओ गेलनि पिरीतक अढ़ाई आखर नहि छल एकांत मोन कातर ! एहिठामक अकुलाहट कोनो मृगतृष्णा नहि निराकारक थिक साकार दर्शन नहि चिन्ताक श्रीङ्ग चिंतन एत' त' मात्र उतयोगक मंथन दोसरक लिखल नेहक समूल संचयन नहि अश्रु-उच्छ्वास नहि हास परिहास नहि धरती आ ने अकास सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमे हुअए पिरीत तकरे त' छनि विश्वास अचकेमे नहि किछु द' क' बहुत रास क' देली उत्सर्ग सरल नहि एहि पिरीतक अपवर्ग किओ हँसथि रहथु हॅसैत एकरे त' अछि उद्देश्य एहि सर्जनाक ककरो कनायब बड्ड सरल मुदा ! आत्मासँ हँसेबाक लेल चाही सामर्थ्य विराट प्रेमक विवेचन उत्कृष्ठ कोनो अर्थे नहि व्यर्थ !
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शिव कुमार झा टिल्लू ( डॉ शेफालिका वर्माक पत्रात्मक आत्मकथा पढ़लाक -
मुझसे कोई सवाल न पूछो 
मुझसे मेरा हाल  न पूछो। …। 
मैंने अपने वजूद के दो हिस्से कर लिए 
एक प्रश्न करता है दूसरा उत्तर देता है। ।
 मै  खुद ही प्रश्नोत्तर बन गयी 
तुम्ही कहो तुम्हारे सवालों का क्या जबाब दूँ ???

औरों के गम में डूबे हम ऐसे 
अपना भी कुछ वजूद है 
भूल ग
ए थे हम ........

Wednesday, August 5, 2015

सांसों का खेला

सबों के अपने अपने  किस्से हैं , 
अपने अपने फ़साने हैं 
बहाने  भी अपने हैं...ये  ज़िन्दगी के हिस्से हैं 
सावन  ऑंखें चुपचाप कहती जाती कितनी बातें 
कितनी सौगातें , कितने खुशियों के पल 
 एक दिन हम न होंगे, बातें सारी यूँ ही रह जाएगी '
बीते दिन याद दिलाएगी  … 
ये सांसों का खेला है बस। . 
सब  कुछ तो  है पर तेरे बिन मन अकेला है…