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Thursday, August 6, 2015


एक तरफ हवा बसन्ती
एक तरफ मन का मधुकर
दोनों से मन उदास पड़ा था
एक तरफ मोबाइल एक तरफ लैपटॉप
खुला पड़ा था
कभी व्हाट्स एप्प की आवाज़
तो कभी एफ बी में मेसेज की टिक टिक
इन सब को सुनती निढाल पड़ी थी
आवाजें कान में आ आकर दस्तक देती रही
पर मै
अनसुनी करती रही
क्या है इन सब में वही रोज रोज का खेला
अच्छी बुरी बातों का मेला
सबों को सुनती मेरा मन अकेला
थक जाती हूँ
नही अब ये सब छोड़ दूंगी
अब नही डूब पाऊँगी
इन स्नेह भंवर में ----------
तभी बसंत की सिहरन में
सब कुछ भूल जाती हूँ
उन्ही संवादों के स्नेह-भंवर में
डूब डूब जाती हूँ

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