Thursday, March 21, 2013


अपने अपने दर्द अपने अपने गीत हैं एक साज़ पर बजता ये संगीत है 
सभी अकेले चलते हैं , यादों की बारात लेकर , अपनी भूख अपनी प्यास लेकर 
कवि  नही चलता अकेला ,उसके साथ कविता की झंकार है
मुस्काती ,हाथ थामे ज्यों काँटों के बीच गुलाब है .....
 
Apne apne dard apne apne git hain / sabhi akele chalte hain / yadon ki barat lekr  ,apni bhukh apni pyas lekr / kavi nhi chalta akela , uske sath kavita ki jhankar hai / muskati ,hath thame jyon kanto ke bich gulab hai.....

Wednesday, March 20, 2013

मै कोई ठूंठ दरख़्त नहीं हूँ 
जिसमे ना हो जीवन की धडकन 
वो टूटी शाख भी नहीं हूँ 
जिस पे ना चहचहाना चाहती हो बुलबुलें में
मै पतझड़ का ओ वृक्ष हूँ 
जहाँ आशाओं कामनाओं की कोंपलें 
जन्म लेती रहती है , प्यार के सावन को 
तरसती रहती है 
मुझे गुजरा वक़्त मत समझो जो 
लौट कर आता नहीं , ना ही वो पथ्थर समझो 
जिसे आवाजों के तीर बिंधते नहीं
मै बंजर नहीं ,जहाँ आशाओं की खेती होती नहीं है
मुझे लाश मत समझो
मेरी सांसे अभी भी चलती रहती है...



mai koi thhunthh darakht nahi hun / jisme na ho jiwn ki dhadkan / mai vo tuti shakh bhi na hun , jis pe na chahchahana chahti है bulbulen / mai patjhad ka vo vriksh hun jahan ashaon kamnaon ki konple jnm leti rahti hai / pyar ke sawn ko tarasti rahti hai / mujhe gujra waqt mt smjho ,jo laut kr aata nahi / na hi vo paththr samjho ,jise awajon ke tir bendhte nhi/mai banjar nhi jahan ashaon ki kheti hoti hi nahi / mujhe lash mt samjho , meri sansen abhi bhi chalti rahti hai........

ये लताएँ ....


लताएँ तरुवर का सहारा ले आगे 
बढती हैं किन्तु, 
बेसहारा नही होती ये लताएँ 
सहारे की तलाश करती भी नही 
ये लताएँ 
अपना रास्ता खोजती 
अपनी मंजिल को तलाशती 
धरती की ही गोद में ,उसी के वक्ष पर 
यत्र तत्र फ़ैल जाती ये लताएँ ..
जिन्हें आकाश छूने की ललक है 
वो किसी न किसी उर्ध्वगामी तरुवर  का 
सहारा ले 
ऊँचाइयों के सपने देखने लगती है 
कामनाओं की डोर  बुनने लगती है 
प्यार से दुलार से  तरुवर को 
अपनी भुजाओं में बांध लेती  ये लताएँ 
और फिर 
तरुवर का ह्रदय स्पंदित ; प्रकम्पित लता की आत्मा 
शिव और शक्ति कीतरह 
प्रकृति और पुरुष की तरह 
आसमान की ऊँचाइयों को छूने का 
प्यार ममता मानव कल्याण का औदात्य भाव 
बिखेरने का संकल्प लेती 
पनपती जाती ये लताएँ ............





Tuesday, March 19, 2013

दिल्ली से आगरा कोच में


पीछे से आती तेज़ ठहाकों की आवाज़ !
मै थी कि गहरी नींद में डूबी जा रही थी 
जैसे मुझे कितने दिनों बाद ये चैन की नींद 
नसीब हुई हो 
क्या रिश्ता था 
नींद और ठहाकों में ? 
शायद ये कवि -ह्रदय  की  निश्छल आवाज थी 
जो हौले हौले थपकियाँ दे मुझे 
सुला रही थी 
बिना किसी  शिकवे शिकायत ! .....

मै नींद की घाटियों में उतरती जा रही थी .....
और 
सात अजनबी भाषाओँ को लिए बस सरपट 
सड़कों पर दौड़ रही थी .........

                     ( दिल्ली से आगरा कोच में )

Pichhe se aati tez thahakon ki awaj / aur mai gahri nind me dubi ja rahi thi / jaise mujhe kitne dino baad ye chain ki nind nsib hui ho / kya rishta tha nind aur thahakon me / shayd ye kavi hriday ki nishchhl awaz thi / jo houle houle thapkiyan de mujhe sula rahi thi / bina kisi shikve shikayt ke / ../ mai nind ki ghatiypon me utarti ja rahi thi ../ aur saat aznbi bhashaon ko liye bs sarpt sadkon pr doud rahi thi........

Monday, March 18, 2013


कोरे कागज़ की तरह होते हैं जीवन 
जो चाहो लिख दो तुम 
मै तो क्या कोई कुछ भी न बोलेगा  
बोलना चाहे  तब भी नही 

कलम तुम्हारे हाथ है 
जो चाहो लिख दो तुम 
लिखने की आज़ादी सब को है 
बोलने की भी  आज़ादी सब को है 
लिखो  बोलो तेरा अपना मन है .. हाँ मन ??
लिखने से पहले , बोलने से पहले 
क्या अपना मन ही तुम्हे नही टीसता  होगा ??
कागज के सीने से चीख क्या नही 
उठती होगी >>???


Kore kagaz ki tarah hote hain jivan 
Jo chaho likh do tum 
Mai to kya koi kuchh bhi na bolega 
Bolna chahe tb bhi nhi 

Kalam tumhare hath hai 
Jo chaho likh do tum 
Likhne ki azadi sb ko hai 
Bolne ki bhi azadi sb ko hai 
Likho bolo tera apna mnn hai .. han mnn ??
Likhne se pahle bolne se pahle 
Kya apna mnn hi tumhe nhi tistaa hoga ?
Kagaz ke sine se chikhen kya nhi uthhati hongi ...???


Sunday, March 17, 2013

समय का चक्र


शक्तिशाली सूरज को बादल ही नही 

कभी कभी 

छोटे छोटे धूल कण भी सघन हो 

धूल धूसरित कर  देते हैं 

पता नही किस अपराध का बदला लेते हैं 

सूरज छटपटाता बाहर आने को 

पर समय का चक्र !

उसे भी नही छोड़ता 

हम इंसानों की क्या हस्ती ...?

ताज


ताज! 
 मुमताज़ को मैंने रात के अँधेरे में  उसाँसे भरते देखा 
फिर  धूप की तपिश में छटपटाते भी देखा 
आंसू बहाती 
शाहजहाँ की सूखी बेनूर  आँखों को देखा 
जो यमुना को भी उदास कर गयी  थी 
पता नही कैसी पूरनमासी  की रात होगी 
जिसने  अपने आगोश में मुमताज़ और शाहजहाँ
को लेकर  
सारे कायनात को
पागल कर दिया होगा ..........

Wednesday, February 27, 2013

MAI NA RAHUNGI............

एक दिन ऐसा भी आएगा 
जब तेरे पास मै ना रहूंगी 
हरसिंगार सी मै तो बिखरी मिलूंगी 
सुगंध बन के मन प्राणों में तेरी 
मै बसती रहूंगी................
मेरी कमी तुम ना महसूस करना 
तेरे दिल में यूँही मुस्कुराती रहूंगी
जन्मो में मै ना मिलूंगी तुम से 
साल में एक बार तो आती रहूंगी 
आँख नम ना करना कभी तुम 
तेरे होठो पे बन के हंसी मै
खिलखिलाती रहूंगी...
देख लो मौसम आ गया फिर
शेफालिका सी यूँही बिखरी मिलूंगी...

Ek din aisa ayega jb tere pas mai na rahungi/ harsingar si mai to bikhri milungi ,sugandh bn ke mn-prano me teri mai basti rahungi / meri kmi tum na mahsus karna /tere dil me yunhi muskurati rahungi / jnmo me mai na milungi tum ko sal me ek bar to aati rahungi/ aankh nmm na karna kbhi tum ,tere hothho pe bn ke hansi mai / khilkhilati रहूंगी/ dekh lo mousam aa gaya fir ,shefalika si yunhi bikhri milungi ......


ओहि वसन्तोत्सव में  अहांक  अदृश्य कर
अंगराग  
लेपि गेल हमरा 
चानन  पीर जगाय गेल हमरा 
अहाँक स्वप्निल आंगुरक सिहरन 
अहंक अदृश्य मधुमय छुवन 
समस्त तन में संगीत लिखि गेल 
हमर समस्त मोन के 
बांसुरी   बनाय  गेल 
भय होइत अछि  प्रभो !
ओहि संगीत के अहाँ बिसरि नहि जाय 
मुरली उपेक्षित नहि राखि दी अहाँ .......

समग्र धरती सौंसे अकासक विस्तृति में 
समा नहिओहि वसन्तोत्सव में  अहांक  अदृश्य कर
 पओत दुःख हमर 
आह !
प्राणक ई अप्रतिहत आकुल नाद !!!!!


अहाँक ओ अधर स्पर्श !
मोन-प्राण के कविता बनाय गेल 
अधरक गुलाब विहुंसी  गेल 
ठोर हमर गुलाब बनि गेल 
सूखल जीवन 
प्रेमक रंग स रंगी गेल 
तनक हरीतिमा मिलन गीत गाबि गेल 
मोनक मोर नाचि गेल 
मुदा 
बंद पलक अचकहि खुजि गेल 
निन्न टूटी गेल 
गुलाबक पंखुरी झरि झरि 
धरती पर खसि  गेल 
अहाँ कतोउ  नहि छलों 
कत्तो नहि 
किन्तु, 
प्रकृतिक कण कण अहाँ कें धारण केने 
नाचि रहल छल 
हम नमित भ उठलौं ........