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Friday, July 6, 2012

सडक के उस पार तुम्हारे शहर से
आती
रौशनी की सतरंगी किरणे
मेरी बंद खिड़की को पार कर
मेरे सिरहाने बैठ जाती है
जैसे कोई संदेसा तुम्हारा लेकर आती है....
दिल को सुकून पहुंचाती है..
रौशनी के सैलाब में डूबी
तुम्हारे होने का एहसास महसूसती
मेरी रूह
कितने नगमे गा जाती, कितने गीत
सुना जाती......
और फिर सुबह की धुंध की सफ़ेद चादर सी
फ़ैल जाती है..
सारा आलम चैन से सोया
कोहरे में डूबा ...
जानती हूँ मेरी तरह तुम सब भी ना
सोये होगे ..
तुम्हे तो धुंध के चादर को चीर
संदेसा भेजने की आदत सी है....
और मुझे पढने की...........

5 comments:

  1. तुम्हे तो धुंध के चादर को चीर
    संदेसा भेजने की आदत सी है....
    और मुझे पढने की........

    जाने कहाँ गए वो दिन... ...........अब मैं कुछ लापरवाह हो गया हूँ क्या?

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    2. .मुझे लाश मत समझो
      मेरी सांसे अभी भी चलती रहती है........
      Thanx alot....
      kuchh nhi shayd bahut hi..........

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    3. HAN MANNU ,laparwah hi nhi tum beparwah bhi ho gye.. jise tumne itna chaha, maan samman diya kitne door ho gaye usse ...
      tumhe ehsas to hua.. aaj dekha to achchha lga.....

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